Here is the Hindi translation of the previous piece, done with a lot of effort by Sonika Thakur!
अगर
पुरुषों को माहवारी होती तो क्या होता
महिला 1: क्या आपने कभी सोचा है कि अगर पुरुषों को माहवारी होती तो क्या होता?
महिला 2: एक मिनट.... माहवारी! माहवारी तो महामारी की तरह सुनाई देता है,जैसे कि
कोई
बीमारी हो।
महिला 1: हाँ सच में! मैं कह रही थी कि अगर अचानक कोई जादू हो जाए और माहवारी महिलाओं
की बजाये पुरुषों को आने लगे तो?
महिला 2: तब तो माहवारी बेशक एक बहुत ही आकर्षक, मर्दाना, गर्व
करने वाली चीज़ बन जायेगी।
महिला 3: हां! पुरुष इस बात पर डींगें हांकेंगे कि उनके पीरियड कितने लम्बे और
कितने ज़्यादा चले।
महिला 4: माहवारी का शुरू होना मर्दानगी का सबूत माना जाएगा। लड़के इसे
धार्मिक रिवाज़ों और स्टैग पार्टी के रूप में मनाएंगे।
महिला 5: और सेनेटरी पैड्स की तो बात ही मत पूछो! सारे सेनेटरी प्रोडक्ट्स
सरकार द्वारा मुफ्त में दिए जायेंगे या टैक्स फ्री होंगे। और पुरुष उन्हें अखबार
में छिपा कर तो बिल्कुल नहीं ले जायेंगे!
महिला 6: और न ही काले प्लास्टिक के थैलों में!
महिला 6: दवाइयों की दुकानों पर हे भाई -पैड्स और यारों का यार टेम्पोंस भरे
दिखेंगे! आदमियों के लिए कोई “व्हिस्पर” नहीं
होगा!
महिला 1: न ही केयरफ्री! न सोफी! न परी!
महिला 2: गलियों के लड़के शेखी बघारेंगे कि, “मैं तो तीन पैड वाला आदमी हूँ।“
महिला 3: अगर उन्हें कोई कहे, “भाई,
तुम
आज बहुत अच्छे लग रहे हो!” तो वह हाई-फाइव करते हुए कहेंगे........
महिला 2: “हां,
भाई, क्यों नहीं, माहवारी का समय जो है! इसी से तो चेहरे
पे चमक आती है!” वे यह कह के कभी नहीं छुपाएंगे कि “मैं डाउन हूं” या “महीने का वह समय है!”
महिला 4: अखबारों में ऐसी सुर्खियां होंगी --- “माहवारी वाले पुरुषों में शार्क के हमले का
खतरा!” या “जज ने बलात्कारी को मासिक तनाव का हवाला दे कर छोड़ दिया!”
महिला 5: और फिल्मों में क्या होगा ----"खून का रिश्ता” और “ख़ूनी भाई” फिर से सुपरहिट शीर्षक बन जायेंगे! और हीरो होंगे ----
टाइगर श्रॉफ और वरुण धवन!
महिला 6: और सोचिए, पुरुष
क्या हर महीने पेट में मरोड़े झेलेंगे? सरकार तो उनके लिए पीरियड का दर्द मिटाने के लिए
राष्ट्रीय “दर्द मिटाओ दर्द हटाओ” संस्थान खोल देगी!
महिला 1: बिल्कुल! मेडिकल समुदाय “मेल प्री मेंस्ट्रूअल सिंड्रोम (M-PMS)” पर रिसर्च शुरू कर देगा और बड़े-बड़े इलाज निकाल लेगा।
महिला 2: मुझे तो एक सपोर्ट ग्रुप भी दिख रहा है “माहवारी के मारे मर्द - एम् एम् एम्!”
महिला 3: और देखना! माहवारी की छुट्टी सभी संस्थानों में अनिवार्य हो जायेगी।
महिला 4: और निश्चित तौर पर माहवारी से पीड़ित मर्दों को जल्दी छुट्टी दे दी
जायेगी! बेचारे इतनी तकलीफ में कैसे काम करेंगे?
महिला 5: अच्छा! तब शायद महिलायें धार्मिक संस्थानों और सेना में मर्दों से
बड़ा योगदान देंगी। क्योंकि उन्हें माहवारी नहीं आएगी!
महिला 6: इसका बिलकुल उल्टा होगा, जानेमन! सेना के आदमी यह ज़ोर देंगे कि पुरुष ही
सेना
में रह सकते हैं,
क्योंकि
वे “खून देने” के आदी हैं। वे हीरो होंगे क्योंकि वे हर महीने खून बहाते
हैं और दर्द सहते हैं।
महिला 1: धार्मिक कट्टरपंथी कहेंगे कि महिलायें अपवित्र हैं क्योंकि वे हर
महीने अपनी अशुद्धियाँ नहीं निकालतीं।
महिला 5: हद्द हो गई यह तो! क्या ये वही चीज़ें नहीं हैं जो वे कहते हैं कि हम
महिलायें माहवारी की वजह से नहीं कर सकतीं? यह क्या बात हुई।
महिला 6: बस यही तो बात है। इसमें माहवारी का कोई लेना देना नहीं है। असली
मुद्दा तो यह है कि समाज में ज़्यादा ताकतवर कौन है।
महिला 1: अगर माहवारी ताकतवरों को आने लगे, तो माहवारी अचानक एक पॉज़िटिव चीज़
बन
जाएगी। तर्क या लॉजिक से इसका कोई लेना देना नहीं है।
महिला 5: तर्क से इसका कोई लेना देना नहीं है?
महिला 2: हाँ,
तर्क
से इसका कोई लेना देना नहीं है? जैसे कि गोरे लोगों ने सब को विश्वास
दिला
दिया है कि उनकी गोरी त्वचा उन्हें बाकियों से श्रेष्ठ बनाती है। जबकि वास्तव में
गोरी त्वचा….
महिला 3: …. उन्हें यू वी किरणों के प्रति ज़्यादा सेंसिटिव बनाती है और झुर्रियों
का कारण बनती हैं। मतलब कि कोई भी गुण सिर्फ इसलिए ज़्यादा मांग में होता है
क्योंकि वह ताकतवरों का चिन्ह होता है।
महिला 5: तो तुम यह कह रही हो कि अगर माहवारी महिलाओं की बजाये पुरुषों को आना
शुरू
हो जाए, तब भी महिलाओं कि लिए कुछ नहीं बदलेगा।
है ना!
महिला
4: बदलेगा!
(सभी औरतें कहेंगी “क्या”?)
महिला 4: यही..…
कि हमें अपने बेचारे माहवारी वाले भाइयों, बेटों और पतियों की और ज़्यादा सेवा
करनी पड़ेगी!
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