A Day in the Life of...
I woke up while it was still dark. I hated getting out of the warm bed, but it had to be done. I had volunteered to cook for the family today because mummy needed to rest. She had been in so much pain last night.
एक दिन प्रतिदिन
जब अलार्म के तीखे शोर ने मुझे जगाया, तब अँधेरा ही था। मैंने
जैसे तैसे अलार्म बंद किया और अपने गरम बिस्तर से निकली। आज खाना बनाने की ज़िम्मेदारी
मैंने ली थी क्योंकि मम्मी की तबीयत ठीक नहीं थी। कल रात उनके पेट का दर्द कम ही नहीं
हो रहा था।
अनुज अपने बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा था। वो रात को कब आया, मुझे
नहीं पता। पिछले तीन दिनों से उसने हमारे साथ डिनर नहीं किया। उसके मुताबिक़ वो अपने
दोस्तों के साथ कॉलेज फेस्टिवल की प्लानिंग कर रहा था। कुछ भी! पर उसकी बात तो सब सच
मान लेते हैं। जो करना है, करने देते हैं।
मेरी बात और है। पिछले महीने, मुझे परीक्षा की तैयारी के लिए रोहिणी के घर रुकने की भी पर्मिशन नहीं मिली थी। रोहिणी और उसके परिवार को सब अच्छे तरह से जानते
हैं, फिर भी मनाही? मैंने कितनी विनती करी थी, पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अनुज उस वक़्त
चुप-चाप सब सुनता रहा। उसके मुँह से मेरे पक्ष में एक शब्द नहीं निकला। मैंने भी सोच
लिया कि मैं उसका यह “सहयोग” कभी नहीं भूलूंगी। उस दिन के बाद से हमारी बातचीत ना के
बराबर ही थी।
बिना शोर मचाये मैं ठंडी रसोई में गयी और अगले एक घंटे तक सबके लिए नाश्ता
और दोपहर का खाना बनाती रही। कॉलेज के लिए तैयार होने से पहले मैंने मम्मी के कमरे में झाँककर देखा कि वे ठीक हैं या नहीं। मैं उनका चेहरा तो नहीं देख सकी, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि वह आराम से सो रही थीं।
आज बस बहुत देर से आई! मुझे देर करना बिल्कुल पसंद नहीं, लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? यह सब मेरे हाथ में तो नहीं है। राहत की बात यह है कि मेरी
कक्षा के आठ और छात्र भी उसी बस से आते हैं, इसलिए भगवान का शुक्र है कि मुझे अकेले ही महाजन सर की डाँट नहीं खानी पड़ेगी। मैं
और रोहिणी हमारे रोज़ के ठिकाने, पेड़ के नीचे मिले और दौड़ते हुए कक्षा में पहुंचे। महाजन सर खुद ही देर से आए थे, इसलिए हमें अनुशासन और समय की पाबंदी पर भाषण नहीं सुनना पड़ा। खुद देर से आने की उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी।
लगता है सारे नियम सिर्फ़ हम छात्रों के लिए ही होते हैं!
लंच टाइम में रोहिणी और मैंने साथ बैठकर खाना खाया। मैंने उसे अनुज और उसकी देर शाम की मीटिंग्स के बारे में बताया। वो भी
बोली कि ज़रूर अनुज दोस्तों के साथ मस्ती कर रहा होगा। यह प्लानिंग शानिंग तो एक बहाना
लगता है। लड़के ऐसे ही होते है, अपनी आज़ादी का गलत फ़ायदा उठाते हैं, जबकि हम लड़कियों को छोटी-सी आज़ादी भी नहीं दी जाती। मैंने
मन में सोचा “शुक्र है कोई और भी मेरी तरह सोचता है।"
फिर उसने मुझे अपने बस के साथियों से सुना हुआ एक नटखट सा
चुटकुला सुनाया। मैं इतनी ज़ोर से हँसी कि कुछ छात्र मुड़ कर मुझे देखने लगे। अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैं किस तरह हंस रही थी और मैंने मन में सोचा, काश, मैं भी शनाया की तरह ज़्यादा सलीकेदार होती!
लो जी, जिस की चर्चा हो रही थी, वही शनाया कैंटीन से निकल कर हमारी तरफ़
चली आ रही थी। ढीला-ढाला कुर्ता, ढीली पैंट्स और कंधों पर सहजता से डाला हुआ दुपट्टा,
वह पूरी तरह शालीनता की मिसाल लग रही थी। हमेशा की तरह, उसके पीछे दो-तीन चमचे चल रहे थे। बिल्कुल किसी राजकुमारी की तरह!
तभी रोहिणी
खड़ी हो गई। शनाया के सामने ज़्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं.
लेकिन मैं ऐसा
नहीं करती। मुझमें इतनी गरिमा तो है। वह भले ही कॉलेज की सुंदरता
की रानी हो, लेकिन हर मामले में हमसे बेहतर नहीं है। निश्चित तौर पर, पढ़ाई में तो वह मुझसे बिल्कुल भी बेहतर नहीं है। आखिर मैंने लगातार दो बार कक्षा में टॉप किया है!
मैंने रोहिणी को खींच कर बैठा दिया और उसका ध्यान भटकाने की कोशिश की। पर यह क्या? शनाया तो मुझसे ही बात करने लगी! उसने पूछा कि बॉयज़ कॉलेज का अनुज क्या मेरा भाई है। जब मैंने हाँ कहा, तो उसने एक बनावटी-सी मीठी मुस्कान दी और मुझसे उसे एक संदेश देने को कहा।
एक संदेश? अनुज को? उस राजकुमारी की तरफ़ से? मैं पल भर के लिए अचकचा गई।
उसने मुझसे कहा कि मैं अनुज से कहूँ कि 14 तारीख के फैशन शो का समय सुबह
से बदलकर दोपहर को कर दे, क्योंकि वह सुबह खाली नहीं है। उसने ख़ास तौर पर ज़ोर देकर कहा कि यह संदेश आज ही पहुँचाना ज़रूरी है, क्योंकि तय किया गया फाइनल कार्यक्रम कल सुबह सब से पहले पोस्ट कर दिया जायेगा।
मैंने अनचाहे ही सिर हिला दिया, हालांकि, बाद में मुझे एहसास हुआ कि दुनिया को अपनी सुविधा के अनुसार ढालने की उसकी
आदत थी। 14 तारीख़ की सुबह उसे ठीक नहीं लगी, तो उसके मुताबिक पूरा कार्यक्रम बदल दिया जाए! जैसे महारानी के बिना फैशन शो हो ही नहीं सकता!
उसके जाने के बाद, मैंने रोहिणी की ओर शर्मिंदा
होके देखा। अनुज सच में पार्टी नहीं कर रहा था। वह वाकई फ़ेस्टिवल की प्लानिंग में व्यस्त था! क्योंकि
मैं उससे नाराज़ थी, मैंने उस के बारे में गलत धारणा बना ली थी।
घर पहुँचकर मैंने देखा कि मम्मी धूप में बैठी हैं। डॉक्टर की दवा असर कर गई थी और अब उन्हें दर्द नहीं
था। जब मम्मी ने मुझे खाना बनाने के लिए थैंक यू बोला, तो मैं निशब्द उनके गले लग गई
और अपने आसूं उनके कन्धों पे पोंछ डाले।
उस रात मैं देर तक जागती रही ताकि अनुज से बात कर सकूँ। लगभग आधी रात को वह घर लौटा। जब मैंने उससे फ़ेस्टिवल के बारे में पूछा तो वह हैरान हुआ, लेकिन फिर उसने पूरे कार्यक्रम की जानकारी मुझ से शेयर की। उसने यह भी बताया कि वे इस आयोजन को खास और अलग बनाने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं। उसका उत्साह मुझे भी उत्साहित कर गया। वह खास तौर पर 14 तारीख़ की सुबह होने वाले फैशन शो के लिए बनाए जा रहे, शानदार रैंप को लेकर बहुत उत्साहित था।
14 तारीख़! सुबह का समय!
फिर उसने सुझाव दिया कि मैं, सबसे बड़ी पढ़ाकू,
14 तारीख़ की दोपहर को, फैशन शो के बाद होने वाली स्क्रैबल और बॉगल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लूँ।
और ज़ाहिर है, मैंने हाँ कह दिया। मैं एकदम मान गई!
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